आखरमाला

मैं हिंदू हूँ। यद्यपि मंदिर नहीं जाता। गीता, रामायण, महाभारत, श्रीमद्भागवत, दुर्गा सप्तशती जैसी अनेक पुस्तकें, बिना किसी आस्था, विश्वास के, सहज पाठकीय जिज्ञासा और चाव से पढ़ी हैं। बचपन में ‘हनुमान चालीसा’ का पाठ करते समय लगता था कि संकट के समय बजरंगबली सहायक होंगे। उन दिनों गाँव के चारों ओर बाग थे, जहाँ आम के बुजुर्ग दरख्त जमीन से गलबहियाँ करते रहते। कुछ तो इतने पुराने कि शाखें खोखली पड़ चुकी थीं। हवा चलती तो तनों के चरमराने की आवाज सुनाई पड़ती। सूखे पत्ते झर-झर कर जमीन पर लोटने लगते। मानो जिस तने से वे अब तक लिपटते आए हों, स्नेह और समर्पण की पराकाष्ठा में उसके धराशायी होने से पहले खुद समाधिस्थ हो जाना चाहते हों। दिन में वे बाग अकसर सुनसान रहते। गुजरना पड़े तो धड़कनें अपने आप बढ़ जातीं। उस समय सिर्फ बजरंगबली का सहारा होता। लेकिन न तो कभी किसी प्रेत से मुलाकात हुई…

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