पुरालेख

मासिक पुरालेख: अगस्त 2012

आखरमाला

मैं हिंदू हूँ। यद्यपि मंदिर नहीं जाता। गीता, रामायण, महाभारत, श्रीमद्भागवत, दुर्गा सप्तशती जैसी अनेक पुस्तकें, बिना किसी आस्था, विश्वास के, सहज पाठकीय जिज्ञासा और चाव से पढ़ी हैं। बचपन में ‘हनुमान चालीसा’ का पाठ करते समय लगता था कि संकट के समय बजरंगबली सहायक होंगे। उन दिनों गाँव के चारों ओर बाग थे, जहाँ आम के बुजुर्ग दरख्त जमीन से गलबहियाँ करते रहते। कुछ तो इतने पुराने कि शाखें खोखली पड़ चुकी थीं। हवा चलती तो तनों के चरमराने की आवाज सुनाई पड़ती। सूखे पत्ते झर-झर कर जमीन पर लोटने लगते। मानो जिस तने से वे अब तक लिपटते आए हों, स्नेह और समर्पण की पराकाष्ठा में उसके धराशायी होने से पहले खुद समाधिस्थ हो जाना चाहते हों। दिन में वे बाग अकसर सुनसान रहते। गुजरना पड़े तो धड़कनें अपने आप बढ़ जातीं। उस समय सिर्फ बजरंगबली का सहारा होता। लेकिन न तो कभी किसी प्रेत से मुलाकात हुई…

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आजकल AAJKAL

कभी-कभी लगता है कि युद्ध इंसान की जरूरत है। इसलिए वह युद्ध के नए-नए तरीके ईजाद करता रहता है। किसी ने कहा है ‘शांति चाहिए तो युद्ध करो’। सभ्यता के विकास की कहानी पर गौर करें, तो यह बात सच प्रतीत होती है। कुछेक हालिया घटनाएं एक नए प्रकार के संघर्ष की दस्तक दे चुकी हैं। इस लड़ाई में सूचना और आधुनिकतम संचार तकनीक का जमकर इस्तेमाल होने के कारण इसे साइबर युद्ध का एक प्रकार माना जा रहा है।

पिछले दिनों बेंगलुरु, हैदराबाद, मुंबई, पुणे, चेन्नै समेत देश के कई हिस्सों से पूर्वोत्तर भारत के लोग भाग रहे थे। कारण यह कि पूर्वोत्तर के लोगों के मन में यह डर बैठ गया था कि उनकी जिंदगी खतरे में है।

इसके पीछे इंटरनेट और सोशल साइटों की बड़ी भूमिका थी। क्योंकि, कुछेक बहुत लोकप्रिय सोशल साइट पर ऐसे स्टेटस अपडेट हुए कि पूर्वोत्तर के लोगों को बेंगलुरु, पुणे आदि शहरों में…

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